असम विधान सभा ने आज समान नागरिक संहिता (UCC) बिल को बहुमत में पारित किया, जबकि विपक्ष ने इसे व्यापक परामर्श के लिए चयन समिति में भेजने की मांग की थी, जिसे प्रमुख ने ठुकरा दिया।
मुख्य समाचार
विधान सभा के स्पीकर ने विपक्ष की मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि बिल पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। बहुमत ने बिना संशोधन के बिल को स्वीकृति दी, जबकि कांग्रेस और आसाम कांग्रेस के सांसदों ने इसे ‘धर्मीय तानाशाही’ कह कर विरोध किया।
बिल में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और व्यक्तिगत कानूनों को एक समान राष्ट्रीय ढांचे में लाने की प्रावधान हैं, जिससे धार्मिक या जातीय आधार पर अलग-अलग कानूनों को समाप्त किया जाएगा। विपक्ष का तर्क है कि यह कदम सामाजिक विविधता को खतरे में डाल सकता है, परन्तु सरकार का कहना है कि यह सामाजिक समरसता और न्याय को बढ़ावा देगा।
प्रभाव और महत्व
असम में UCC का पारित होना राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि अन्य राज्यों में भी इस तरह के कदम उठाए जाएँ तो भारत में व्यक्तिगत कानूनों की एकरूपता संभव हो सकती है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में सरलता और समानता आएगी। वहीं, यह निर्णय धार्मिक एवं सांस्कृतिक समूहों में संभावित विरोध को भी जन्म दे सकता है, जिससे सामाजिक संतुलन पर असर पड़ने की संभावना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र.: समान नागरिक संहिता बिल क्या है?
उ.: यह एक विधेयक है जो भारत में सभी धर्मों के नागरिकों के व्यक्तिगत कानूनों को एक समान राष्ट्रीय कानून में बदलने का प्रस्ताव रखता है, जैसे शादी, तलाक, उत्तराधिकार आदि।
प्र.: असम में इस बिल को चयन समिति में क्यों नहीं भेजा गया?
उ.: विधानसभा के स्पीकर ने माना कि बिल पर व्यापक परामर्श की आवश्यकता नहीं है और इसे तुरंत पारित करके राष्ट्रीय एकता और समानता के लक्ष्य को आगे बढ़ाना आवश्यक है।




