संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत के साथ एक रणनीतिक समझौता किया है जिससे दोनों देशों को दुर्लभ पृथ्वी और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित होगी, जबकि चीन पर निर्भरता घटाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। यह समझौता ट्रम्प प्रशासन के बाद से चल रहे विविधीकरण प्रयासों को सुदृढ़ करता है।
मुख्य बिंदु
संयुक्त राज्य और भारत ने लिथियम, ग्रेफ़ाइट, टैंटल और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं जैसे आवश्यक खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए एक व्यापक सहयोगी ढांचा तैयार किया है। दोनों पक्षों ने एक संयुक्त कार्यसमिति स्थापित करने पर सहमति जताई है, जो खनन, प्रसंस्करण और निर्यात नियमों को सरल बनाकर निवेश को आकर्षित करेगी। इस समझौते के तहत, भारत को अमेरिकी कंपनियों को तकनीकी सहायता और वित्तीय समर्थन प्रदान करने का प्रस्ताव भी मिला है।
पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर ट्रम्प के कार्यकाल में, वाशिंगटन ने चीन से खनिज आयात पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए थे। अब यह नई समझौता उन नीतियों को व्यावहारिक रूप में बदलते हुए, भारत को एशिया‑पैसिफिक क्षेत्र में मुख्य आपूर्ति स्रोत के रूप में स्थापित करने की दिशा में है। अमेरिकी कांग्रेस ने भी इस साझेदारी को समर्थन देने के लिए बजट में अतिरिक्त निधि आवंटित करने की घोषणा की है।
प्रभाव और महत्व
यह समझौता न केवल दोनों देशों की आर्थिक सुरक्षा को बढ़ाएगा, बल्कि चीन के विरुद्ध रणनीतिक संतुलन भी स्थापित करेगा। भारत को उच्च तकनीकी खनिजों के बाजार में नई संभावनाएँ मिलेंगी, जिससे उसकी उद्योगिक विकास गति तेज होगी। वहीं, अमेरिकी इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और रक्षा उद्योग को स्थिर आपूर्ति मिलने से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलेगी। इस कदम से भारत‑अमेरिका संबंधों में भी नई ऊर्जा का संचार होगा, जिससे एशिया‑पैसिफिक में शक्ति संतुलन बदल सकता है।




