ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर हाल ही में उठे बगावती संकेतों ने राजनीतिक विश्लेषकों को सवालों में डाल दिया है – क्या यह दल जल्द ही टूट सकता है? दो बड़े नेताओं, ऋतब्रत और हुमायूँ कबीर, के बयान इस पर और चर्चा को बढ़ा रहे हैं।
राजनीतिक माहौल और ऋतब्रत का उदय
कुशल रणनीतिकार ऋतब्रत, जिन्होंने अब तक अपना नेता ममता बनर्जी को ही बताया, अचानक TMC के भीतर सत्ता संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया है। उनके करियर का सबसे बड़ा संकट तब आया जब उन्होंने पहली बार विधायक पद हासिल किया, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी साख अजित पवार या शिंदे जैसी नहीं मानी जा रही। यह असंतोष कई युवा विधायक और कार्यकर्ता वर्ग में गूँज रहा है, जिससे 28 साल पुरानी पार्टी में अस्थिरता की लहरें उठ रही हैं।
हुमायूँ कबीर का पहला रिएक्शन और बगावत की शुरुआत
ABP News के अनुसार, हुमायूँ कबीर ने TMC की संभावित टूट पर खुलकर कहा, "खेल तो अब शुरू होगा"। दिल्ली से शुरू हुई बगावत ने पहले ही 58 विधायक को अलग‑थलग कर दिया है, और कई बार-बार बैठकें शुब्हेंदु के नेतृत्व में आयोजित हो रही हैं, जहाँ ममता बनर्जी का कहना है कि पार्टी के मूल सिद्धांतों को नहीं छोड़ा जाएगा।
प्रभाव और महत्व
यदि तृणमूल कांग्रेस टूटती है, तो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आ सकता है। विपक्षी दलों को नए गठबंधन का अवसर मिलेगा, जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस विखंडन का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। साथ ही, राज्य की सामाजिक‑आर्थिक नीतियों पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि TMC की नीतियों में अब तक स्थिरता का अभाव देखा गया है।



