कांग्रेस सांसद शाशि थारू ने 1960 के दशक में मुंबई के ब्रिच कैंडी क्लब से ‘रेसिस्ट प्राविजन’ के तहत बाहर निकाल दिए जाने की बात दोबारा याद की, जब दिल्ली जिमखाना क्लब के संभावित सरकारी अधिग्रहण पर बहस छिड़ी। यह बयान पुराने क्लबों में मौजूद औपनिवेशिक व वर्गीय भेदभाव को फिर से उजागर करता है।
मुख्य समाचार
थारू ने एक साक्षात्कार में बताया कि तब के क्लब के नियमों में गोरे सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती थी और गैर‑गोरे या कम आय वर्ग के लोगों को अक्सर बाहर कर दिया जाता था। उन्होंने कहा, “मैं भी उस समय ब्रिच कैंडी क्लब में गया, लेकिन ‘रेसिस्ट प्राविजन’ के कारण मुझे बाहर कर दिया गया”। इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी, क्योंकि इसी समय केंद्र सरकार ने दिल्ली जिमखाना क्लब की ज़मीन को रक्षा मंत्रालय को सौंपने की योजना का प्रस्ताव रखा है।
दिल्ली जिमखाना क्लब, जो 1919 में स्थापित हुआ था, आज भी कई राजनैतिक और सामाजिक समारोहों का केंद्र माना जाता है। सरकार का दावा है कि इस जमीन को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये पुनः उपयोग किया जाना चाहिए, पर विरोधी पक्ष इसे क्लब की ऐतिहासिक पहचान और सदस्यों के अधिकारों की अनदेखी मानते हैं। थारू की बातों ने इस मुद्दे को सामाजिक समानता के प्रश्न तक ले जाया है।
प्रभाव और महत्त्व
ब्रिच कैंडी क्लब की कहानी और दिल्ली जिमखाना क्लब का विवाद दोनों ही भारत में पुराने क्लबों में निहित वर्गीय, जातीय और सांस्कृतिक बाधाओं को उजागर करते हैं। यदि सरकार जमीन को रक्षा मंत्रालय को देती है, तो यह एक precedent सेट कर सकता है, जिससे अन्य प्राचीन क्लबों की भविष्य में भी पुनः समीक्षा हो सकती है। साथ ही, यह मुद्दा राजनीतिक दलों के बीच सत्ता और सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग पर नई बहस को जन्म देगा।
FAQ
प्रश्न 1: क्या दिल्ली जिमखाना क्लब का अधिग्रहण अभी तय हो चुका है?
उत्तर: नहीं, अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है; सरकार ने प्रस्ताव रखा है और संसद व सार्वजनिक मंच पर चर्चा जारी है।
प्रश्न 2: ‘रेसिस्ट प्राविजन’ क्या था?
उत्तर: यह एक अनौपचारिक नियम था जो क्लबों में गोरे सदस्यों को प्राथमिकता देता था और अन्य वर्गों के लोगों को बाहर कर देता था, मुख्यतः औपनिवेशिक समय में लागू था।
यह मुद्दा न केवल क्लबों की ऐतिहासिक संरचना को बल्कि समकालीन भारत में सामाजिक समानता की दिशा को भी चुनौती देता है।




