बॉम्बे हाई कोर्ट की दो ज्यूरी, जस्टिस भरती दांगरे और जस्टिस मंजुशा देशपांडे ने फैसला सुनाया कि पत्नी का दैनिक घर के काम न करना "मानसिक क्रूरता" की श्रेणी में नहीं आता। यह निर्णय विवाह में बराबरी के सिद्धांत को सुदृढ़ करता है।
मामले में महिला ने अपने पति द्वारा घरेलू कार्यों को अनिवार्य करने के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें प्रतिवादी ने यह दावा किया कि उसका इनकार पति के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा रहा है। कोर्ट ने कहा कि घरेलू जिम्मेदारियों को केवल पत्नी तक सीमित करना लैंगिक पक्षपात है और यह भारतीय संविधान के समानता सिद्धांत के विरुद्ध है।
जस्टिस दांगरे ने कहा, "विवाह दो समान व्यक्तियों के बीच का साझेदारी है, न कि एक नियोक्ता-नौकर का संबंध।" उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यदि कोई पति-पत्नी के बीच असहमति है, तो इसे सुलह या मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, न कि कानूनी तौर पर "मानसिक क्रूरता" के रूप में पेश किया जाना चाहिए।
इस निर्णय का प्रभाव भारतीय पारिवारिक कानून में एक नई दिशा स्थापित करता है। यह न केवल महिलाओं को घर के बाहर करियर बनाते रहने की आज़ादी देता है, बल्कि पति-पत्नी के बीच सम्मान और समान अधिकारों की भावना को भी बल देता है। भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायालय अधिक साक्ष्य-आधारित, संवेदनशील और समानतावादी रुख अपनाने की संभावना है।




