भारत और नेपाल के बीच 210 साल पुराना लिपुलेख विवाद फिर से सुर्खियों में है, जहाँ नेपाली संसद में प्रधानमंत्री बालेन शाह पर भारतीय जमीन पर कब्जे का आरोप लगा है। इस बीच चीन ने अपनी रुख़ स्पष्ट कर दिया है, जिससे दोनों देशों के कूटनीतिक सम्बंधों में नया मोड़ आया है।
विवाद की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
लिपुलेख (Lepcha) क्षेत्र, जो वर्तमान में काठमांडू के निकट स्थित है, को लेकर भारत और नेपाल के बीच सीमा मानचित्र में अंतर रहता आया है। ब्रिटिश राज के समय तैयार किए गए मानचित्रों को दोनों देशों ने अलग‑अलग माना। 2024 में नेपाल की संसद में इस मुद्दे को उठाने पर विपक्ष ने प्रधानमंत्री बालेन शाह से साक्ष्य देने की मांग की, जबकि शाह ने कहा कि यह भारत का ‘कब्जा’ है।
चीन की स्थिति और क्षेत्रीय प्रभाव
चीन ने इस विवाद पर तटस्थता का आह्वान किया, परन्तु कई आधिकारिक बयानों में उसने भारत के साथ अपने strategic partnership को उजागर किया, जिससे नेपाल को असहाय महसूस हो रहा है। चीन की इस रुख़ को कई विशेषज्ञ ‘भौगोलिक संतुलन’ के रूप में देखते हैं, क्योंकि भारत और नेपाल दोनों ही चीन की सीमा के निकट हैं।
प्रभाव और महत्व
यह विवाद केवल दो देशों के बीच सीमा मुद्दा नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करता है। यदि भारत और नेपाल के बीच समझौता नहीं हो पाया, तो चीन की मध्यस्थता या समर्थन दोनों देशों के आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को बाधित कर सकता है। इसी कारण से दोनों पक्षों के राजनयिक चैनल सक्रिय हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यह मुद्दा उठ रहा है।



