भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में चुनावों की तैयारी में हरेक चरण में सीआईआर (स्पीशल इंटेन्सिव विज़न) की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सीआईआर अवैध नहीं ठहरा और चुनाव आयोग ने कानून के मुताबिक ही काम किया है। इस फैसले के बाद जनता दल (एक) ने सरकार का सीधा समर्थन किया है।
न्यायालय ने पांच विशिष्ट सवालों के जवाब दिए हैं जिनमें सीआईआर की प्रक्रिया, विशेषकर वोटर लिस्ट में नामों को हटाने और जोड़ने के अधिकार के बारे में चर्चा की गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट को संभालने और संशोधित करने का संपूर्ण अधिकार है, चाहे उसमें सेक्टरल सर्किट मैप का उपयोग किया हो या न हो। इसके साथ ही कोर्ट ने स्थानीय स्तर पर शिकायतों के संबोधन के लिए भी संस्थागत मेकानिज्म को मजबूत करने का भी सुझाव दिया।
जेडीयू ने फैसले के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला तार्किक और कानूनी है। पार्टी ने कहा कि उनका मानना है कि सीआईआर की प्रक्रिया ने दल के उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में डालने में मदद की है और इससे बिहार की राजनीति में स्थिरता का संदेश मिला है। वहीं, विपक्षी दलों ने इस फैसले को लेकर अपनी राय व्यक्त करने के लिए तैयार रहे हैं।
इस फैसले के सम्मय सीधे चुनाव मैदान में क्रियाशील होने वाले चुनाव प्रचारियों को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट में ढील देने के अधिकार को मजबूत किया है, जबकि उम्मीदवारों और नागरिकों को अपने वोट दायरे में शामिल करने के मौके को ब




