सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि यदि कोई व्यक्ति केवल मौन दर्शक के रूप में शारीरिक या मानसिक क्रूरता का सामना करता है, तो उसे अपराध के लिए मुकदमा चलाने का आधार नहीं बनता। इस फैसले ने पारिवारिक संबंधों में दुरुपयोग के मामलों में नए कानूनी मानदंड स्थापित किए हैं।
मुख्य ख़बर
सुप्रीम कोर्ट के 4-सदस्यीय पैनल ने 12 मार्च, 2026 को दिए गए निर्णय में स्पष्ट किया कि "मौन दर्शक" होने पर अपराध की ज़िम्मेदारी केवल दुरुपयोग करने वाले पर ही आती है, न कि देखने वाले पर। यह निर्णय एक पूर्व उच्चतम न्यायालय के मामले पर आधारित था, जिसमें एक दम्पती को ससुराल में शारीरिक और मानसिक दुरुपयोग का सामना करना पड़ा था।
न्यायालय ने कहा कि मौन दर्शक होने के बावजूद यदि किसी को शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचती है, तो उसे रिपोर्ट करना अनिवार्य है, परन्तु मौन रहने से उसे अपराधी नहीं माना जाएगा। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि ससुराल के सदस्यों के बीच दुरुपयोग के मामलों में पीड़ित को न्यायिक सहायता मिलती है, जबकि दर्शकों को दंडित नहीं किया जाएगा।
प्रभाव और महत्व
इस निर्णय से परिवारिक अपराधों के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ेगी और पीड़ितों को अधिक भरोसा मिलेगा कि वे अधिकारियों से मदद माँग सकते हैं। साथ ही यह निर्णय ससुराल के सदस्यों को दुरुपयोग की जाँच और रोकथाम के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढाँचा प्रदान करेगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि मौन दर्शक होने के बावजूद यदि किसी को किसी भी प्रकार की हिंसा या दुरुपयोग का सामना करना पड़े तो उसे पुलिस अथवा कोर्ट से सहायता लेनी चाहिए।
FAQ
- Q1: क्या मौन दर्शक को दंडित किया जा सकता है?
A1: नहीं, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार मौन दर्शक को दंडनीय नहीं माना जाता। - Q2: क्या पीड़ित को रिपोर्ट करना अनिवार्य है?
A2: हाँ, पीड़ित को किसी भी प्रकार के दुरुपयोग की रिपोर्ट पुलिस या नज़दीकी क़ानूनी संस्था को करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय परिवारिक दुरुपयोग के मामलों में पीड़ितों के लिए एक नई आशा लेकर आया है, जिससे वे कानूनी सहायता पा सकें।


